सरहाने रख रही हूँ
एक मतला दो शेर ---
मैं किताबें अब सरहाने रख रही हूं,
चंद वरकों में ज़माने रख रही हूं,
हर वरक संजीदगी के नाम है,
एक माज़ी सोलह आने रख रही हूं,
इक तजुर्बों का पुलिंदा,हर नफ़स,
ज़िन्दगी के ताने-बाने रख रही हूँ,
कुछ अंधेरे और दिए बुझने की राख़
और धुंए के कुछ ख़ज़ाने रख रही हूँ,
गोकि एहसास-ए-घुटन हलका न हो,
बंद करके,कुछ दहाने रख रही हूं,
जिस की दम पे दिन गिने हैं उम्र भर,
अपनी तस्वीही के दाने रख रही हूँ,
एक खनक आहों के हिस्से की भी है,
सबके अपने-अपने ख़ाने रख रही हूं,
उर्मिला माधव,
28.10.2017
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