अकारण ही
क्यों अकारण ही करें पीड़ित हृदय को,
स्वयम ही स्वीकार लें बाधित समय को,
हर नदी की संधि है,सागर के तट पर,
ये हुआ, स्वीकारना निश्चित विलय को,
जब कभी सागर ने अपने बांध तोड़े,
कौन कर पाया है,मर्यादित प्रलय को ?
प्रेम की अभिव्यक्ति हो निर्मल हृदय से,
तब कहाँ सीमाएं,अनुमोदित प्रणय को ?
हम स्वयम प्रहरी हैं अपनी भावना के,
और नहीं तोड़ेंगे, अनुबंधित वलय को,
उर्मिला माधव,
8.10.2017
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