नज़्म हमारे मुल्क की सरहद पे

हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे,
 
लो  देखो रात हो आई, हुए सब नींद के तालिब,
रहें सरहद से वाबस्ता, हों चाहे मीर या ग़ालिब,

खड़े रहते हैं जो पहरों रखे बंदूक कांधों पर,
जगे रहते हैं वो नज़रें टिका कर घर की मांदों पर,

कई जलसे, कई शादी, कई फंक्शन गुज़रते हैं,
बिला शिकवा बिला आहों के इस गुलशन पे मरते हैं,

जहान-ए-ज़िन्दगी सबकी बमुश्किल ही गुज़र पाती,
किसी भी शख़्स की दुनियाँ, अचानक ही ठहर जाती,

दहानों पर खड़े सैनिक ज़बां से गर मुकर जाते,
हर इक राखी, दिवाली और होली पे जो घर जाते,

मगर है आफ़रीं उनको, ये दुनियाँ जिनके दम से है,
ओ मेरे भाई, मेरे घर के जान- ओ-तन के रखवाले,
यहां मैं सर-ब-सजदा हूँ, तुम्हें आदाब करती हूँ,
तुम्हारी याद के दम पर ये घर मेहराब करती हूँ,
तुम अपने क़ीमती लम्हों से कुछ लम्हे चुरा लाना,
ये बहना मुनहसिर तुझ पर, ज़रा इक बार आ जाना,
दर-ओ-दीवार तुमको याद करके, मुन्तज़िर हरदम,
यहां हर साल इक राखी के धागे हो रहे हैं नम..
तुम्हारी बहन के आंसू जो बहते हैं कहाँ ठहरे,
हमारे मुल्क की सरहद पे देते हैं जवां पहरे,
हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे,
उर्मिला माधव
22.8.2018

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