दामन ए दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे
दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे,
बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे?
आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत,
सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे?
रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है,
है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे,
लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल,
सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे,
आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या,
ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे,
अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ?
देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे...
उर्मिला माधव....
22.8.2016
Comments
Post a Comment