Posts

Showing posts from August, 2020

कासा नहीं रखती

ज़रूरतमंद हूँ लेकिन कोई कासा नही रखती, इरादा जो भी रखती हूं कभी आधा नहीं रखती, मेरी आवाज़ का हिस्सा फ़लक तक भी पहुंचता है, जो कहती हूँ बुलंदी से,ज़ुबाँ सादा नहीं रखती, मेरे खूँ में तो नाफ़रमानियाँ, शामिल नहीं हरगिज़, मगर इल्ज़ाम है सर पर, के ये वादा नहीं रखती, अभी कुछ ज़ख़्म रिसते हैं,अभी कुछ वक्त बाक़ी है, ये ग़म बहने का ज़रिया हैं तो मैं फ़ाहा नहीं रखती, मुझे भी क़ब्र तक ले जाएगी बादे सबा इक दिन इसी डर से मैं अपनी रूह पे साया नहीं रखती उर्मिला माधव, 30.8.2017

देख लूँ क्या?

इक ज़रासा,रुख़ बदल कर देख लूं क्या, फिर तुम्हारे साथ चल कर देख लूं क्या? आंधियों का ज़ोर तो है मंज़िलों तक, फिर ज़रा गिर कर संम्भल कर देख लूँ क्या? ज़िंदगी का तो चलन हरदम वही है, फिर नए सांचे में ढल कर देख लूँ क्या ? छा गए आ कर अंधेरे रूह पर भी, फिर ज़रा ख़ुद से निकल कर देख लूँ क्या? उर्मिला माधव

सुनाया है

कभी शेर-ओ-सुखन अपना कभी नगमा सुनाया है, असल में इन तरीकों से ब-मुश्किल ग़म छुपाया है... रखा पास-ए-अदब मैंने,सभी अहबाब की खातिर, कलेजा देख लो मेरा,....नशेमन तक जलाया है... हज़ारों रंग देखे हैं मेरी नज़रों ने घबरा कर, मगर दिल ने मुझे जबरन बहकने से बचाया है... अजब ये दोगली दुनियां,ग़ज़ब है दिल का भोला पन बहुत कुछ फैसले करके ........क़दम पीछे हटाया है... किसीके साथ क्या चलना,मैं तनहा ही भली हूँ बस ये मेरा ख़ास मुस्तक़बिल है .....मैंने ख़ुद बनाया है।।। उर्मिला माधव.... 24.8.2015...

ज़ाहिर है

जो मेरी ज़िंदगी है ज़ाहिर है, इक महज़ ख़ुदकुशी है,ज़ाहिर है. ऐसा जीना भी एक गुनाह सही, फ़िर भी ये कट रही है ज़ाहिर है... उर्मिला माधव, 24.8.2017

छोड़ दो दिल से दिल मिलाना क्या?

छोड़ दो दिल से दिल मिलाना क्या ? अब किसी को भी आज़माना क्या ? जो हुआ उसको ख़ूब होने दो, बेवज्ह अपना दिल दुखाना क्या ? तयशुदा बात ही तो गुजरी है, इसलिए यूँ भी अचकचाना क्या? अपने मुंह से कहो,"मुबारक हो" अश्क आँखों में झिलमिलाना क्या? किस क़दर हादसात झेले हैं, इस तरह आज डगमगाना क्या? उर्मिला माधव..

जितनी भरनी हो आंख

जितनी भरनी हों आँखे भर आयें इतनी ज्यादा कि दरिया कर जायें , चाहे मरने जीने पे बात जा पहुंचे , गैर मुमकिन है उनके घर जाएँ , जितने दावे किये हैं बढ़-बढ़ के , आज साबित वो आके कर जाएँ, हैं परेशान वो अगर मेरी तरहा, घर से निकले तो बस इधर आयें, जो मुहब्बत की रहगुज़र मैं हैं , उनको वाजिब नहीं कि डर जाएँ... !! ............उर्मिला माधव............. २३.८.२०१३

अब कोई मंज़र

अब कोई मंज़र पसे मंज़र नहीं, हम फ़क़ीरों का कोई भी घर नहीं, जो मुक़द्दर में लिखा मिल जायगा, बे-सबब हम घूमते दर -दर नहीं, हम जमा करते नहीं है कौड़ियाँ, इक क़फ़न ही चाहिए,बिस्तर नहीं, कर रहे आपस में सब पंजःकशी, ये मिरा है,वो तिरा पत्थर नहीं, इसको अपनी क़ब्र में लगवाएंगे, इससे बढ़कर और कुछ बदतर नहीं, -------------------------------------------- ab koii manzar pase manzar nahin, ham faqiiron ka koii bhii ghar nahin, jo muqaddar main likhaa mil jaayegaa, be-sabab ham ghoomte dar-dar nahin, ham jamaa karte nahin hain kaudiyaan, ik qafan hii chaahiye,bistar nahiin, kar rahe aapas main sab panjah qashii, ye miraa hai,wo tiraa paththar nahin, isliye ki qabr main lagwaayenge, isse badhkar or kuchh badtar nahiin... उर्मिला माधव... 23.8.2014...

देखा गौर से

एक मतला तीन शेर--- उसने कल चेहरे को देखा गौर से, मुझको हैरत सी हुई इस तौर से, रुख़ पै माज़ी की लिखी है हर लकीर, वक़्त ये गुज़रा है जिस-जिस दौर से, उसको अपना जानके बांटा था ग़म,  कौन कहता है वगरना और से, इससे पहले ये हिले बुनियाद भी, तर्क करना है त-आल्लुक ठौर से... #उर्मिलामाधव... 23.8.2015...

सच ही होगा

आप कहते हैं के ये सच है तो सच ही होगा, सबका लजपाल फ़क़त रब है तो रब ही होगा, लोग कहते हैं ....मेरा क़त्ल सरे महफ़िल हो उसपै होना है अगर अब तो ये अब ही होगा, उर्मिला माधव

बस शहीद ही मर के ख़ुश हैं--- मधुवन की ग़ज़ल

किसीके इसरार परपर मधुवन का कलाम फिर से पोस्ट कर रही हूँ.. Madhuvan Rishirajकी लिखी हुई अद्भुत ग़ज़ल... बस शहीद ही मर के खुश हैं बाकी सब तो डर के खुश हैं हाय ज़माना कैसा आया... कातिल दुनिया भर के खुश हैं कोई बात जो इनकी सुन ले शायर मुजरा करके खुश हैं फौजी सरहद पर हैं मरते सांप हमारे घर के खुश हैं नीचे क़त्ले आम सही पर आक़ा सब ऊपर के खुश हैं सब के सब ये भूख के मारे सामने तेरे दर के खुश हैं तेरी गली में मौत बिछी है फिर भी यार गुज़र के खुश हैं -MR

मुर्दार तो तू भी नहीं

Main agar majboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabishtaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin BewafaiI ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach to ye hai pyar se, bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav.. 23.8.2017

एक बहुत ख़ाली सड़क--नज़्म

एक बहुत ख़ाली सड़क प आंख से ज़्यादा नहीं, इक ज़ुबाँ ख़ामोश हर पल चीख से लड़ती हुई, इक अजब वहशत सी तारी सोज़-ए-पिन्हानी में ग़र्क़,  पर कभी देखा नहीं उस ज़र्द पेशानी पे दर्द चार सू खामोशियों का शोर सा उठता हुआ, एक तन्हा दिल ग़मों की भीड़ से लड़ता हुआ, कितनी लंबी चुप्पियों का हौसला रखते हुए, लब तबस्सुम का मुलम्मा ख़ूबियों से ओढ़ कर, ख़ुद ब ख़ुद ही अपने हाथों,अपने दिल को तोड़ कर, रोज़ उसको आते-जाते देखते रहना है  बस .... उर्मिला माधव, 23.8.2017

मुर्दार तो तू भी नहीं

--फ़िल बदीह का हासिल - Main agar mazboot hoon murdaar to tu bhi nahin, Raasta roke mera wo haar to too bhi nahin, Barq aaii thi kabhi girne, dabistaaN ki taraf, Maine hans ke kah diya, gulzaar to tu bhi nahin, Khud ba khud to jal rahi hai,tu sarapa aag hai, Ghar jala kar hans saki,har baar to tu bhi nahin, Muddaton se jal rahe hain ham to sehra ki tarah, Par samandar saA kahin kirdar to tu bhi nahin Bewafai ka abas,ilzaam kyun mere taiiN, Saahib-e-kirdaar saa gham khwaar to tu bhi nahin, ZindagI ko jaa-b-jaa ruswa kare hai kisliye, Sach to ye hai pyar se, bezaar to tu bhi nahin.... Urmila Madhav.. 23.8.2017

नज़्म हमारे मुल्क की सरहद पे

हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे,   लो  देखो रात हो आई, हुए सब नींद के तालिब, रहें सरहद से वाबस्ता, हों चाहे मीर या ग़ालिब, खड़े रहते हैं जो पहरों रखे बंदूक कांधों पर, जगे रहते हैं वो नज़रें टिका कर घर की मांदों पर, कई जलसे, कई शादी, कई फंक्शन गुज़रते हैं, बिला शिकवा बिला आहों के इस गुलशन पे मरते हैं, जहान-ए-ज़िन्दगी सबकी बमुश्किल ही गुज़र पाती, किसी भी शख़्स की दुनियाँ, अचानक ही ठहर जाती, दहानों पर खड़े सैनिक ज़बां से गर मुकर जाते, हर इक राखी, दिवाली और होली पे जो घर जाते, मगर है आफ़रीं उनको, ये दुनियाँ जिनके दम से है, ओ मेरे भाई, मेरे घर के जान- ओ-तन के रखवाले, यहां मैं सर-ब-सजदा हूँ, तुम्हें आदाब करती हूँ, तुम्हारी याद के दम पर ये घर मेहराब करती हूँ, तुम अपने क़ीमती लम्हों से कुछ लम्हे चुरा लाना, ये बहना मुनहसिर तुझ पर, ज़रा इक बार आ जाना, दर-ओ-दीवार तुमको याद करके, मुन्तज़िर हरदम, यहां हर साल इक राखी के धागे हो रहे हैं नम.. तुम्हारी बहन के आंसू जो बहते हैं कहाँ ठहरे, हमारे मुल्क की सरहद पे देते हैं जवां पहरे, हमारे मुल्क़ की सरहद पे देते हैं जवां पहरे, उर्मिला माधव 22.8.2018

एक मतला दो शेर

जो तमाशा है....उम्र भर का है, ये ही किस्सा हर एक घर का है, आज तक भी ये राज़ लगता है, बाद मरने के...ये किधर का है ? मेरे जगते ही......रूह जग जाए, मुन्तजिर दिल उसी सहर का है  उर्मिला माधव...

दामन ए दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे

दामन-ए-दश्त से बाहर क्या निकल पाएंगे, बात इतनी सी है क्या फिर न इधर आएंगे? आते-जाते हुए लोगों को यहाँ देखा बहुत, सोचती हूँ के यहाँ आ के किधर जाएंगे? रूह-ए-ज़िंदान तो रह-रह के सदा देती है, है कशिश दश्त की हर बार फिसल जाएंगे, लाख़ कोशिश हो मगर है ही नहीं,रद्दो बदल, सांसें जितनी भी हैं गिनती की हैं,मर जायेंगे, आबले,ज़ख़्मी जिगर,और न जाने क्या-क्या, ये वो असबाब हैं, घर भर में नज़र आएंगे, अब रही साथ की कोई साथ कहाँ होता है ? देखना सिर्फ़ ये है,कब ये बदल जाएंगे... उर्मिला माधव.... 22.8.2016

वक़्त और हालात

Jul 26, 2016 9:46am   Waqt or halaat kitne bad se badtar ho gaye, Qatilaanaa haadse hii rang-e-manzar ho gaye, Main tumhin se poochhti hun ai zamin-o-aasmaaN, Kaun hain wo jinke sab ahsaas patthar ho gaye, Sochtii hun aadmi kii zaat ko kya ho gayaa, Khoon men duube hue sab teer-o-khanjar ho gaye, koi bhi baaqi nahin ab aurten,bachche jawaan, Dard chiikheN or aansu ye hii ghar-ghar ho gaye, Dast andaazi ki himmat jis kisiine ki wahaaN Sab buridah sar hue or zer-e-nashtar ho gaye, Urmila Madhav... 26.7.2016
दुनिया का रंग देखा और मुस्कुरा दिए हम, ख़ुद को मलंग देखा और मुस्कुरा दिए हम। कुछ दूर तक तो हमने, पीछा किया जहां का, दिल सबका तंग देखा, और मुस्कुरा दिए हम।

ख़सारा कर दिया

दोस्ती के नाम पे कितना ख़सारा कर दिया, सच कहूं तो दोस्ती का रंग काला कर दिया, यारियां मशहूर कितनी हैं गुज़िश्ता दौर की, आज के माहौल ने सब पारा पारा कर दिया, हम तजुर्बों की हक़ीक़त क्या कहें बतलाइये, दोस्त बनके आगए नाहक़ तमाशा कर दिया, उर्मिला माधव  5.8.2018 Dosti ke naam pe kitanaa khasara kar diya, Sach kahun to dosti ka rang kaalaa kar diyaa, YariyaN mash-hoor kitni hain guzishta daur kii, Aaj ke mahoul ne sab para-para kar diyaa, Ham tahurboN ki haqiqat kya kahen batalaiye , Dost ban-ke aa gae, naahaq tamasha kar diyaa Urmila Madhav 5.8.2018