सहर भी

आई है अगर रात तो होनी है सहर भी,
भरपूर उजाला है उधर होगा इधर भी,

तकदीर की ये ज़िद है मुझे कुछ नहीं देना,
उसपे हूँ मुन्तज़िर, हो ज़रा एक नज़र भी,

ज़ानूँ पै रखा सर तो झुका दिल भी यक़ायक़,
गुज़रा है बड़ी टीस से ये लख्त-ए-जिगर भी,

अंजाम से वाकिफ हूँ मगर रोज़ तकूँ राह,
रखता है एतमाद से वो सबकी ख़बर भी,

सूंघा है कभी हमने अगर दिल ये मसल के,
इसरार जो होता है,तो होता है असर भी.....
उर्मिला माधव ...
8.6.2015

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