खरे हैं

हम जहन्नुम से निकल कर आए हैं,बिलकुल खरे हैं,
कुछ तो ऐसे ज़ख़्म हैं जो आज भी अब भी हरे हैं,

इस क़दर हमने तपिश ख़ुर्शीद की बरदाश्त की है,
ग़ैर मुमकिन है समझना…...जीते जी हैं या मरे हैं...
उर्मिला माधव
14.6.2017

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