शाम तुमको पहुंचे

तन्हाइयों से सजकर हर शाम तुमको पहुँचे,
अल्फ़ाज़ आख़री हैं,पैग़ाम तुमको पहुंचे।

जितना भी हो सका था,बर्दाश्त के मुताबिक,
हम जो भी कर रहे थे,वो काम तुमको पहुंचे।

अब कहके क्या करेंगे, क्या-क्या रहा मुक़ाबिल,
लबरेज़ उलझनों का,बस जाम तुमको पहुंचे।

गर मुस्तकिल है कुछ भी,तो आबला-ए-पा ही
एक शक़्ल-ए-बानगी में बस बाम तुमको पहुँचे।

किस दर्जा हम लड़े हैं,इक तिश्नगी से अपनी,
आवारगी का सारा इलज़ाम तुमको पहुंचे।।
उर्मिला माधव...
13.6.2016

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