तलाश में
यूँ ही हम भी घर से निकल पड़े, किसी रहगुज़र की तलाश में,
कई मुश्किलें भी गुज़र गईं ,इसी इक सफ़र की तलाश में,
मेरे ख़ुश्क होठों पे गर हंसी,कभी आई भी तो रुकी नहीं,
तभी डगमगा के रुके क़दम किसी इक सहर की तलाश में,
कभी एक शब भी न कट सकी, यूँ ही बैठे-बैठे गुज़ार दी,
कभी वक़्त सारा गुज़र गया, किसी एक दर की तलाश में,
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment