होती रहे

तीरगी में बस गुज़र होती है,पर होती रहे,
सादगी से ही बसर होती है, पर होती रहे,

अपनी आंखों की तलब अब रौशनी हरगिज़ नहीं,
तीरगी सब को ख़बर होती है, पर होती रहे,

हादसों की रौ में,क्या है वक़्त ये देखा ही कब ?
ज़िन्दगी अब ख़ुद बजर होती है, पर होती रहे,

कोई भी यक़ता नहीं इस दह्र में अच्छा-बुरा,
बन्दगी ज़ेर-ओ-ज़बर होती है, पर होती रहे,

रेत पर दरिया खड़ा था हम कहाँ रखते क़दम,
तिशनगी भी पुर ख़तर होती है,पर होती रहे
उर्मिला माधव,
3.5.2017..

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