आज़माने की ज़िद है
हमें ख़ुद को ख़ुद आज़माने की ज़िद है, जहाँ को अक़ीदत जताने की ज़िद है, ब दम टूट सकते हैं मरने की हद तक, ये कूव्वत जहाँ को दिखाने की ज़िद है, मुहब्बत में झुकना,झुकाना अबस ही, ये अहमक चलन है,बताने की ज़िद है, अगर हमसे उल्फ़त है आजाओ ख़ुद ही, हमें भी, तुम्हें, नईं बुलाने की ज़िद है, जुदा रंग अपना ज़माने के रंग से, कि ताहद इसे बस निभाने की ज़िद है... वजूहात इसके नहीं ख़ास कुछ भी, हमें अपनी ज़िद बस निभाने की ज़िद है... उर्मिला माधव ...