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Showing posts from May, 2020

आज़माने की ज़िद है

हमें ख़ुद को ख़ुद आज़माने की ज़िद है, जहाँ को अक़ीदत जताने की ज़िद है, ब दम टूट सकते हैं मरने की हद तक, ये कूव्वत जहाँ को  दिखाने की ज़िद है, मुहब्बत में झुकना,झुकाना अबस ही, ये अहमक चलन है,बताने की ज़िद है, अगर हमसे उल्फ़त है आजाओ ख़ुद ही, हमें भी, तुम्हें, नईं बुलाने की ज़िद है, जुदा रंग अपना ज़माने के रंग से, कि ताहद इसे बस निभाने की ज़िद है... वजूहात इसके नहीं ख़ास कुछ भी, हमें अपनी ज़िद बस निभाने की ज़िद है... उर्मिला माधव ...

आदत नहीं रही

दुनिया में किसी शै से मुहब्बत नहीं रही, हमको किसीके प्यार की आदत नहीं रही, आगे क़दम तो पीछे अदावत के जाल हैं, दिल से मिलें किसीसे भीे,चाहत नहीं रही, दिल के बहुत क़रीब थे जब वो बदल गए, मजबूरियां थी,दिल को अक़ीदत नहीं रही, फ़ेहरिस्त दोस्तों की.....,नहीं याद अब हमें, हाँ अब किसी भी नाम से उल्फ़त नहीं रही, वो वक़्त कोई और था जब प्यार में थे हम  वो जोश वो जुनूं ......वो इबादत नहीं रही  बातें मज़ाहिया सी,ज़रा हंस के चुटकियाँ, लब-ए लवाब है .......के वो रंगत नहीं रही... उर्मिला माधव..

समझते हैं

ख़ुद को शायर तो सब समझते हैं, सच को कहने से...साफ़ बचते हैं, ख़ुद की नज़रों में ख़ुद मेयारी हैं, सातवें आसमां पै रहते हैं  बात लिखते भी हैं मुहब्बत की, उसपे हाथों से मुंह को ढकते हैं, अब कहो ये भी कोई बात हुई, दिल में गर्द-ओ-ग़ुबार रखते हैं, रु-ब-रु कोई जो कहे आकर, अपनी नज़रों से बगलें तकते हैं, जब भी मीज़ान पर वफ़ा तौली, उस घड़ी कुफ़्र भी ये बकते हैं, ख़ुद को ज़ाहिर करेंगे शाहाना , देखिये इनको जब बहकते हैं, इनकी कमज़ोरियों पे कुछ भी कहें, तब ये अंगार से दहकते हैं.... उर्मिला माधव... 28.5.2016...

तज़बज़ुब से

अब तज़बज़ुब से दम निकलता है, ज़ेहन-ओ-दिल तिश्नगी से जलता है, मेरे ख़ैमे में इतने सूरज हैं, इनकी गर्मी से ग़म पिघलता है, सब बुझाती हूँ अपने हाथों से, रेज़ा-रेज़ा हो जिस्म गलता है, इतना आसान कब है दह्र-ए-सहन, नक़्श-ए-पा रोज़ ही बदलता है, सब लिबासों में छुपके रहते हैं, ऐसा किरदार मुझको खलता है, क्या तमाशा है कुल ज़माना भी, हर कोई उफ़,अदा से चलता है चश्म-ए-पुरनम भी खूँ बहाया करे, वक़्त पर, वक़्त ही पै ढलता है.... उर्मिला माधव... 28.5.2018.... तज़बज़ुब--- असमंजस

बग़ैर मतले की ग़ज़ल

हर सदा का मिरी उसको एजाज़ था, फ़िर भी उसने कभी मुड़के देखा नहीं, उसको अंदाज़ा था मेरी तक़लीफ़ का, वो जो उम्मीद थी उस को तोड़ा नहीं, फ़िर कलेजे पे ग़म की परत जम गई, मुझको ख़ामोशियों ने झिंझोड़ा नहीं, वो यूँ ही रोज़ आता ऑ जाता रहा, मुझको ज़िद सी रही उसको टोका नहीं, मुझको वीरानियों ने रुलाया बहुत, रिश्ते बोसीदा थे, फ़िर भी छोड़ा नहीं, अपनी चाहत में उसको रखा तो मगर, ऐसे जैसे कभी उसको चाहा नहीं, उर्मिला माधव

दस्तार की

वो के जिनको थी ज़रूरत प्यार की, क्यों ........दुहाई दे गए दस्तार की... तितलियों के रंग दिखला कर हमें, बस .मिटाते हैं खिजालत हार की, हम से बढ़कर कौन जाना है उन्हें, दास्तां क्या है.... दिले बीमार की. बस अना के नाम पर ही मिट गए, दिल में लेकर हसरतें दीदार की. उर्मिला माधव 24.5.2015

तलाश में

यूँ ही हम भी घर से निकल पड़े, किसी रहगुज़र की तलाश में, कई मुश्किलें भी गुज़र गईं ,इसी इक सफ़र की तलाश में, मेरे ख़ुश्क होठों पे गर हंसी,कभी आई भी तो रुकी नहीं, तभी डगमगा के रुके क़दम किसी इक सहर की तलाश में, कभी एक शब भी न कट सकी, यूँ ही बैठे-बैठे गुज़ार दी, कभी वक़्त सारा गुज़र गया, किसी एक दर की तलाश में, उर्मिला माधव

तमाशा है

ज़िंदगी है या इक तमाशा है? इसमें भी ट्विस्ट अच्छा ख़ासा है, मेस्मरेज़म भी कम नहीं इसमें, पल में तोला है पल में माशा है, शौर्ट सर्किट से मर गया कोई, जिसके हाथों में एक कासा है, डैम केयर लिखा है चेहरे पर, गोकि सदियों से ग़म सनाशा है  इसके चारों तरफ जो सर्कल है, उसमें हर आदमी ठगा सा है, उर्मिला माधव... 20.5.2015

करते रहिए

मन में लाख़ बिखरते रहिये, काम तो फिर भी करते रहिये, दर्द कोई .....पहचान सके ना, ग़म से ...लाख़ गुज़रते रहिये, क़दम अगर जब साथ न दें तो, हिम्मत से .....दम भरते रहिये, जीने की  ग़र ख्वाहिश है तो, क़दम आग पर धरते रहिये,  जो जी कहता हो वो करलें, बस अंजाम से डरते रहिये, उर्मिला माधव.. 15.5.2017

आबाद है

@urmila_madhav मेरा अपना आशियाँ आबाद है मैं ही सदियों से बहुत वीरान हूँ, ये समझ कर भूल मत करना कभी, तुर्शी-ए-अहबाब से ...हलकान हूँ, लोग मिलते हैं तो हंस देती हूँ बस, पर किसी हरक़त से कब अनजान हूँ... उर्मिला माधव..

ख़ुद परस्ती

ये ज़माना और इसकी ख़ुद परस्ती, मुख़्तसर,इनसान की औक़ात सस्ती,  हो अगर ख्वाहिश कहीं बाकी बकाया  बन तमाशाई जला के दिल की हस्ती, भूलजा सब हम पियाला हम निवाला, याद रख जिंदा दिली और फ़ाक़ा मस्ती,  ************************************** ye zamaana or iskii khud parastii, mukhtsar,insaan kii auqaat sastii, ho agar khwahish kahin baaki baqayaa, ban tamaashaaii,jalaake dil kii bastii, bhooljaa sab ham piyaalaa ham niwaalaa, khoob hai zindaa dilii or faaqaa mastii  उर्मिला माधव... 9.5.2014...

मंज़िलों के बीच

तुम भी नहीं थे औऱ भी कोई नहीं था साथ जलते चराग़ बुझते रहे,मंज़िलों के बीच, फिर भी हवा से जंग बराबर ठनी रही,

सैलाबों के साथ

उम्र भर लड़ते रहे हम कितने सैलाबों के साथ, बंद आख़िर हो गए अब घर की मेहराबों के साथ, ये जुनूने शौक़ ये ............दीवानगी वहशत ज़दा, तोड़ डाले सब मरासिम ज़ीस्त ऑ ख़्वाबों के साथ,.। #उर्मिलामाधव... 9.5.2015।.

बताने वाले

Barmala hamko kbhi apana bataane waale, ho gae gair ke ik duniyan dikhaane waale.. Ham jahan par hain,wahan koii nahin aa saktaa, Rol bhi karne lage pardaa hataane waale,

सनद सी हो गई

सा'ब ये तो हद सी होगई, दिल्लगी सनद सी होगई, बोलने का ये सिला हुआ, बात ही अहद सी हो गई, गुफ़्तगू सियासती भी अब, रोज़ की रसद सी होगई, हारने को और क्या बचा?? बे-ख़ुदी खिरद सी होगई, रोज़-ए-अज़ल गिर जो हम गए, ख़ुद अना ही बद सी होगई आईने की शक्ल क्या कहें, आदमी के क़द सी होगई,  उर्मिलामाधव

उतर गए होते

इतना ज्यादा घबराते तो,डर कर गुज़र गए होते, ख़ुद अपनी ही पाक़ नज़र से कबके उतर गए होते  इसका-उसका हाथ मांगते,कोई राह गुजरने को, इन्कारों की साज़िश से हम कैसे बिखर गए होते, इतनी लम्बी उम्र गुज़ारी,तलवारों की धारों पर, लफ्फाजों से डर जाते तो,जाने किधर गए होते   एक तरफ बंदूकें दन-दन,एक तरफ ज़हरीला,गम  डरने की आदत ग़र होती ,कितने सिहर गए होते, हम साहिल पर खड़े रहे और सैलाबों ने खेल किये, हम ग़र अपना रंग दिखाते,कितने जिगर गए होते, उर्मिला माधव... 3.5.2014...

हरगिज़ नहीं

बेच कर ग़ैरत हमें कुछ चाहिए हरगिज़ नहीं, इससे बेहतर है भले हैं हम जहाँ हैं बस वहीँ... कह दिया उसने हमें दिल जानिए दिलहीरिये, उसके दिल पै हाथ रखके देखना है सच कहीं. #उर्मिलामाधव... 3.5.2015..

होती रहे

तीरगी में बस गुज़र होती है,पर होती रहे, सादगी से ही बसर होती है, पर होती रहे, अपनी आंखों की तलब अब रौशनी हरगिज़ नहीं, तीरगी सब को ख़बर होती है, पर होती रहे, हादसों की रौ में,क्या है वक़्त ये देखा ही कब ? ज़िन्दगी अब ख़ुद बजर होती है, पर होती रहे, कोई भी यक़ता नहीं इस दह्र में अच्छा-बुरा, बन्दगी ज़ेर-ओ-ज़बर होती है, पर होती रहे, रेत पर दरिया खड़ा था हम कहाँ रखते क़दम, तिशनगी भी पुर ख़तर होती है,पर होती रहे उर्मिला माधव, 3.5.2017..