सुनाऊं
छोटी सी दास्ताँ है कहदो तो में सुनाऊं??!
ग़र जो मुलाहिज़ा हो,आगे इसे बढाऊं??...!
छोटी से एक बच्ची पैदा हुई ज़मीं पर,
हर सम्त तीरगी थी,न रौशनी कहीं पर,
बूढ़े पडोसी आये बोले कि क्या हुआ है??
रोते से सब लगें हैं क्या कोई मर गया है ??
घर के बुज़ुर्ग बोले न न ये सच नहीं है,
हंसने की अब हमारी औक़ात बस नहीं है
सब चीज़ ठीक ही है,कुछ भी गमीं नहीं है,
कुछ ख़ास भी नहीं है,न-ख़ास भी नहीं है,
दहलीज़ पर हमारी पैदा हुयी है बच्ची,
इतनी बड़ी मुसीबत किसको लगेगी अच्छी??
सकते में थे पडोसी, बोले कि क्या अजब है!!
बच्ची के मामले में ये सोच भी गज़ब है !!
थोडा सा खांस करके बोले बुज़ुर्ग हंसकर,
हर बात हो रही है इंसानियत से हट कर,
जीने का हक सभीको दुनिया में है बिरादर,
बच्ची हो याकि बच्चा इन्सान सब बराबर
घर के बुज़ुर्ग बोले माथे पे हाथ रख कर,
होता ही क्या है वैसे लफ़्ज़ों से बात ढक कर??
बच्ची की आबरू तक महफूज़ अब नहीं है,
परदे में रहके जीना,जीने का ढब नहीं है...
उर्मिला माधव...
१६.९.२०१३
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