सहर हो गई
क्या कहूँ जुस्तजू को लिए सो गई,
चांदनी उससे पहले ही गुम हो गई,
यक़-ब-यक़ शोर काली घटा ने किया,
गो कि परछाईं जाने कहाँ खो गई,
गाहे-गाहे कड़कने लगीं बिजलियाँ,
दिल धड़कने लगा ज़ोर से रो गई,
नींद टूटी मेरी तो कहीं कुछ न था,
बस ये ज़ाहिर हुआ के सहर हो गई,
जाने क्या बरसा था,रात बरसात में,
कुल ज़माने की सब लज़्ज़तें धो गई..
उर्मिला माधव ..
17.9.2016
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