Raat bhi hai bebhaya jati nahi hai
Sahar kitni be wafa aati nahin hai
Urmila madhav...
रात कैसी बे-हया जाती नहीं,
सहर कितनी बे-वफ़ा आती नहीं,
उर्मिला माधव
गराँ दिल पे गुज़रा है,गुज़रा ज़माना, यूँ रेगे तपाँ में ........रहा आशियाना, हवाओं ने की उम्र भर ही ख़िलाफ़त, हुआ नेस्तोनाबूद ....अपना ठिकाना, हरे ज़ख़्म लेकर ..हुए दर-ब-दर के, शुरू कर दिया सबने..दामन बचाना, जो जज़्बात जम के हुए पत्थरों से, तो दफ़ना दिया हमने हंसना-हँसाना, जहां भर ने हमसे बहुत दिल्लगी की, कड़ा एक भी हमने फ़िकरा कहा ना, अजब कश्मकश से गुज़रते थे,फिर भी, न कुछ ज़िन्दगी से .......बनाया बहाना, नवाज़े गये .....सिर्फ़ तंज़-ओ-तबर से, बहुत सब्र अपना.......पड़ा आज़माना, बहुत चाहते हैं न सोचें हम इस पर, मगर दिल न भूले वो नज़रें चुराना, फ़क़त सच्ची ज़िद के,बहुत हम धनी थे, जो दिल ने न चाहा......न माना,न माना.... उर्मिला माधव, 11.7.2016
तुम हमारी मुश्किलों के साथ कब चल पाओगे, साफ़ कहते हैं के आधी राह पर रुक जाओगे, कौन आख़िर चाहता है,उम्र भर जलता रहे, गर तड़पते देख लोगे,तुम बहुत घबराओगे, ज़ख़्म मत छेड़ो गुज़ारिश कर रहे हैं ऐ मियां, ज़िद अगर कर जाओगे तो बाद में पछताओगे, इक ज़माना हो गया,हम इश्क़ लिखते ही नहीं, हम अगर लिख्खेंगे तुम ही दस तरह बल खाओगे हम भी तो हर चंद ख़ुद को रोकते रहते हैं बस, फिर भी ना माने तो ठंडी आग में जल जाओगे, उर्मिला माधव, 2.11.2017
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