नज़्म---अंधेरी रात
अंधेरी रात में जलते हुए चराग़ों को,
नज़र से देखना और देर तक खड़े रहना,
ज़ेहन में अपनी नदामत का एक अंधेरा है,
जहां ने हमको बड़ी ख़ूबियों से घेरा है,
इसी के साथ बड़ी मुद्दतों से चलते हैं,
हमारे पास कोई वक़्त ही नहीं बाक़ी,
बताओ कैसे किसी और की अदा देखें,
यही बहुत है यहां ख़ुद ब ख़ुद खड़े रहना,
बस अपने आप में जीना है और मर जाना,
किसी भी ग़ैर का अब इंतज़ार क्या करना,
उर्मिला माधव
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