उसूल होगई
इक ज़रा सी भूल हो गई,
ज़िन्दगी ही धूल हो गई,
फूल सारे झड़ के गिर गए,
शाख़-ए-गुल ही शूल हो गई,
मश्क़ हमने बे पनाह की,
हर नफ़स फ़िज़ूल हो गई,
द्वार घर के बंद कर लिए,
जब ख़ला उसूल हो गई,
हादिसे का रंग क्या कहें,
बात-बात तूल हो गई,
हम बहुत ही सादा दिल रहे,
सादगी, मलूल हो गई,
उर्मिला माधव,
21.8.2018
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