देखा बहुत

रात हमने आईना देखा बहुत,
और तब अपने तईं सोचा बहुत,

इस क़दर हावी हुईं कमज़ोरियाँ ?
अपने जी पै तीर,ख़ुद साधा बहुत?

पाँव पर है धूप,सर पर आफ़ताब,
दिल अबस ही शबनमी,भीगा बहुत,

रफ़्ता-रफ़्ता राह भी कट जायेगी,
हमसफ़र क्यों बेवज्ह चाहा बहुत?

अपनी सारी ख़ूबियों को भूल कर,
यार का दर्ज़ा किया ऊंचा बहुत,

उसके बिन जीना हुआ मंज़ूर अब,
एक दामन जो कभी थामा बहुत,

क्या हुआ जो रात भर सोये नहीं,
पर सहर में ख़ुद को तो पाया बहुत...
#उर्मिलामाधव,
26.8.2015..

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