दायरे
खुद मुक़म्मल कर लिए जब दायरे,
ज़ख्म दिल के बे-सबब दिखलाये रे,
मुतमईन होकर किया हर फैसला,
काहेको फिर मन ये अब घबराए रे,
इक गुज़ारिश है मेरी लिल्लाह सुन
कोई तो जीने का ढब सिखलाये रे,
उर्मिला माधव...
26.8.2014...
खुद मुक़म्मल कर लिए जब दायरे,
ज़ख्म दिल के बे-सबब दिखलाये रे,
मुतमईन होकर किया हर फैसला,
काहेको फिर मन ये अब घबराए रे,
इक गुज़ारिश है मेरी लिल्लाह सुन
कोई तो जीने का ढब सिखलाये रे,
उर्मिला माधव...
26.8.2014...
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