गाँव को जाती

होते पंख अगर जो मुझको उड़कर उनके गाँव को जाती,
तब अमरूदों की बगिया मैं छुप कर कहीं बैठ तो पाती,

कोई हवा कहीं जो चलती तन मन उनका छू कर आती,
उनकी साँसों के चन्दन से मेरा तन-मन भी महकाती ,

अपने हाथों से मुंह ढक कर मन ही मन मैं शर्मा जाती,
सांझ अगर जब हो जाती तो घर के आँगन मैं आ जाती,

उनकी थाली के भोजन मैं रस ले कर कुछ मैं भी खाती
उनको नींद नहीं आने पर कोयल बनकर गीत सुनाती,

विरह वेदना भी मिट जाती जो सानिध्य अगर पा जाती,
उनकी अंक शायनी बनती बस चिर निद्रा में सो जाती ...
उर्मिला माधव... 25.8.2013

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