ख़ातून दिल्ली की
लो मेरी दास्तां सुन लो मैं हूँ ख़ातून दिल्ली की,
हिली जाती है अब बुनियाद,अफ़लातून दिल्ली की,
नहीं महफूज़ अस्मत है,के दिल में ख़ास दहशत है,
क़दम बाहर निकालूँ जो तो बस अंजाम वहशत है,
समझ में कुछ नहीं आता के किस दर्ज़ा जिया जाए,
सम्हाले ग़म कोई कितने,ज़ह्र कितना पिया जाये,
ये दिल्ली आज तक लाशों के अंबारों पे रख्खी है,
अभी तक आबरू औरत की मीनारों पे रख्खी है,
न जाने क्या दिया अजदाद ने,दिल्ली को विरसे में,
मेरा दिल चाहता है काश इसको समझूँ फिर से मैं,
जहाँ औरत की अव्वल ज़ात को सस्ता समझते हैं,
करे दिलजोई मर्दों की,यही रस्ता समझते हैं,
मगर मुझमें भी है सीता,कोई रज़िया कोई राधा,
बिना मेरी मुहब्बत के वजूद-ए-मर्द है आधा,
मैं शीरीं हूँ,मैं लैला हूँ,में दुर्गा हूँ,मैं अम्बा हूँ,
अगर सच जानना चाहो तो मैं चिड़ियों का चम्बा हूँ,
मगर जब याद आता है के मैं औरत हूँ दिल्ली की,
बहुत ख़तरे में रहती हूँ,मैं वो ग़ैरत हूँ दिल्ली की,
के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।।
के मैं औरत हूँ दिल्ली की।।।
उर्मिला माधव...
26.2.2016
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