अफ़साना---ज़िंदादिल

ज़िंदादिल....

उस्ताद प्रोफेसर..मुजतबा हुसैन,
महफ़िलों के ग़ुरूर का बाइस,अदब की दुनियां के नामी गरामी शायर, oxford यूनिवर्सिटी में ज़बान के प्रोफ़ेसर,( professor de lingua) आगरा के बाशिंदे थे,इतने ख़ूबसूरत के जहां से भी गुज़र जाते थे हर ख़ास-ओ-आम को मुतास्सिर कर सकने का दम रखते थे।
                 कुछ दिनों से थके-थके से लगने लगे थे।शायद कुछ बीमार रहने लगे थे।उनकी शरीक-ए-हयात का गए साल,इंतकाल हो गया था और बहुत बड़ा ख़ानदान होते हुए भी,अकेला से महसूस करते थे।हर वक़्त जिंदादिल इनसान को थकते और टूटते हुए देखा जा सकता था।लेकिन सब कुछ समझते हुए भी वो हालात को नज़र अंदाज़ किये रहते थे। यूँ तो वो किसीसे भी तवक़्क़ो कभी भी नहीं रखते थे,पर लोगों के तग़ाफ़ुल का अंदाज़ा उनको हो रहा था।
                 किसीसे भी गुफ़्तगू के दौरान कभी शिकायत नहीं करते थे के फलां-फलां शायर उनके क़लाम चोरी करके महफ़िलों में पढ़ रहे थे ।ज़ाहिरी तौर पर कुछ कहते ही नहीं थे पर उनके जी को लगती थी और सोचा करते के 2 कौड़ी के लोग मसनद नशीं हो गए जो एक मिसरा सीधा नहीं कह सकते थे मोहतरम हो गए दिखाई देते थे,उनको हसद कभी किसीसे नहीं हुआ और वो इस बात को पसंद भी नहीं करते थे,उनका मानना था,जो जहां है अपनी किस्मत से है और हां शाइरी को तरन्नुम से कहे जाने के सख़्त ख़िलाफ़ थे...
                      एक रोज़ एक orgniser उनसे मुलाक़ात करने आया,उसका किसी सिलसिले में लंदन आना हुआ था और वो उनसे मिलने जा पहुंचा था,ख़ैर उनके घरवालों ने उसकी ख़ासी आवभगत की,उसने उनको कुछ शेर सुनाने को कहा लेकिन लाख़ इसरार करने पर भी राज़ी नहीं हुए बहरहाल उसको ख़ाली ही लौटना पड़ा और उसने अपने तरीके से उनकी एक तस्वीर अपने मन में बैठा ली, और भारत आकर अफ़वाह उड़ा दी के वो पागल हो गए हैं,उन तक भी बात पहुंची तो वो हक्के-बक्के से रह गए ।। और सोचने पर मजबूर हुए के कोई भी किसीको अपने तेवरऔर अपनी सोच के मुताबिक ही तौलता है बस उन्होंने ख़ुद को अपने ही हिसार में क़ैद कर लिया,वो आज भी हैं लेकिन अपने आप में निहायत ख़ुश और आज भी ग़ज़लें कहते हैं लेकिन वहीं जहां उनका जी चाहता है....
उर्मिला माधव..
19.8.2017

Comments

Popular posts from this blog

गरां दिल पे गुज़रा है गुज़रा ज़माना

kab chal paoge