बड़ी हैं ?
अमां बदनामियाँ सर पे खड़ी हैं,
भला क्या ख़ाहिशें इतनी बड़ी हैं?
सिवा जाओ न हर्गिज़ दायरों के,
के हर जा आंधियां पीछे पड़ी हैं,
तुम्हारे ज़हन में इतना नहीं क्या?
जहां की बंदिशें कितनी कड़ी हैं?
उर्मिला माधव
26.6.2018
अमां बदनामियाँ सर पे खड़ी हैं,
भला क्या ख़ाहिशें इतनी बड़ी हैं?
सिवा जाओ न हर्गिज़ दायरों के,
के हर जा आंधियां पीछे पड़ी हैं,
तुम्हारे ज़हन में इतना नहीं क्या?
जहां की बंदिशें कितनी कड़ी हैं?
उर्मिला माधव
26.6.2018
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