भ्रम
सहारा,
भ्रम ही तो है,
मिल जाना किसीका,
बहुत बार मिल जाना,
और फिर फिर मिलना,
साये की तरह
बिछुड़न भी तो है ही,
कहाँ भूले जाते हैं ?
क्रम है,
तलाश की शुरुआत,
रफ़्तार जारी रखना,
पर हवाएँ पीछा करती हैं,
उड़ा ले जाती हैं,
पुराने नैन नक्श,
कितना भी जोड़ें,
धुंधले से हो जाते हैं,
हम नए में खो जाते हैं,
तन्द्रा के साथ,
जब तक होश आये,
उड़ा ले जाती है हवा,
नए नैन नक्श भी,
फिर अकेले होना है,
स्वयं को भिगोना है,
आधी-आधी रातों में
आती-जाती यादों से,
दो चार होना है,
क्रम है.....
उर्मिला माधव..
2.7.2016
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