बाध्य कर देती है

क्यूँ समझ,सब कुछ समझने को बाध्य कर देती है,
परिस्थिति को और असाध्य कर देती है,
जैसे खैर,खून,खांसी,ख़ुशी,
कैसे भी नहीं छुपते,
और समझ अपना काम करती है,
जो स्पष्ट नहीं,उसे भी समझती है,
और तब कठिन हो जाता है,
समझ के न समझना,
पर यही करने को बाध्य हैं हम,
हाँ समझना है?
हाँ ही कहना होगा,
अन्यथा,खड़े हो जाते हैं,
रिश्तों पर पर प्रश्न चिन्ह,
मैले हो जाते हैं मन,
थकने लगते हैं विचार,
समझ,विचार और संघर्ष,
बीच में रहता नहीं हर्ष,
अलिफ़ लिख्खा है,
कैसे पढ़ा जायेगा उसको शीन?
अलिफ़,अलिफ़ है,
और शीन है शीन,
बस इसीलिए दुनियां है रंगीन,
आदमी,आदमी को पढ़ता है,
आदमी,आदमी से लड़ता है,
जान कर अनजान बनना नियति ही तो है,
वरना मुर्दे ही ढोने होंगे,
रिश्तों की शक्ल में,
नए,मुर्दे,पुराने मुर्दे,गड़े हुए मुर्दे,
उखड कर सामने आयेंगे,
बस समझ बंद करनी होगी,
और आँख भी,
बातों को पीना होगा,ज़हरीले घूंटों सा,
मूर्ख बनके ,हाँ में हाँ मिलानी ही होगी,
वर्ना ... दोस्त दोस्त नहीं रहेंगे,
बिखर जाएगा सब,
कुछ भी मत समझना,
दुनियां के मंच पर बेवकूफ़ का किरदार निभाना है,
राह भी चलते जाना है...
समझ बंद रखनी है,और रास्ते खुले...
उर्मिला माधव...
28.6.2015

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