कर सकते
ग़र जो अफ़साना हुआ ख़ून-ए-जिगर से रंगीं,
इसको तब्दील यूँ नालों में नहीं कर सकते,
जो जिगर चीर तो दे,उफ़ भी नहीं करने दे,
उसका ज़िक्र चाहने वालों में नहीं कर सकते,
चुटकियाँ लेके ग़ुज़र जाती है हवा ज़ख़्मों से,
इसकी गिनती कभी छालों में नहीं कर सकते...
उर्मिला माधव..
23.6.2013
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