राग बहुत हैं
घर के ही खट राग बहुत हैं,
बिन रंगों के फाग बहुत हैं,
अपनी गुज़री दुनियां में भी,
तरह-तरह की आग बहुत हैं,
ये घर को मद्फन कर डालें,
अब ज़हरीले नाग बहुत हैं,
बस चलती हैं खालिस बातें,
जिन बातों में झाग बहुत हैं,
हर लब के अलफ़ाज़ दबा दें,
फटे गले के काग बहुत हैं....
उर्मिला माधव...
22.6.17..
मद्फ़न -- क़ब्रिस्तान
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