कब रही है
ख़ुद समझना चाहते हो तब सही है,
मेरी समझाने की ख़ाहिश कब रही है?
तीरगी जिससे गुज़ारे हम गए थे,
अब नहीं है, जब रही है, तब रही है,
ग़म से हम दामन बचाना चाहते हैं,
ज़िन्दगी बोझों तले अब दब रही है,
उर्मिला माधव
29.5.2018
ख़ुद समझना चाहते हो तब सही है,
मेरी समझाने की ख़ाहिश कब रही है?
तीरगी जिससे गुज़ारे हम गए थे,
अब नहीं है, जब रही है, तब रही है,
ग़म से हम दामन बचाना चाहते हैं,
ज़िन्दगी बोझों तले अब दब रही है,
उर्मिला माधव
29.5.2018
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