ख़्वाब हमारे
नींद हमारी,ख़्वाब हमारे,
चेहरे के सब ताव हमारे,
दिल,गुर्दा और बात जिगर की?
ये मालो असबाब हमारे,
फिर हम क्यूँ पामाल रहेंगे?
क्यूँ कोई अन्दाज़ सहेंगे??
किसने तुम्हें बुलाया,और क्यूँ,
बे मतलब ख्वाबों में आए?
इस्तक़बाल कराके अपना,
क्या-क्या ना अहसान जताए?
और बेवफ़ा कहकर हमको
बे -मतलब इल्ज़ाम लगाए,
क्यूँ हो हमें ज़रूरत उसकी,
जो ख़ुशियों में आग लगाए??
उर्मिला माधव
19.5.2013
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