दम निकलता है
अब तज़बज़ुब से दम निकलता है,
ज़ेहन-ओ-दिल तिश्नगी से जलता है,
मेरे ख़ैमे में इतने सूरज हैं,
इनकी गर्मी से ग़म पिघलता है,
सब बुझाती हूँ अपने हाथों से,
रेज़ा-रेज़ा हो जिस्म गलता है,
इतना आसान कब है दह्र-ए-सहन,
नक़्श-ए-पा रोज़ ही बदलता है,
सब लिबासों में छुपके रहते हैं,
ऐसा किरदार मुझको खलता है,
क्या तमाशा है कुल ज़माना भी,
हर कोई उफ़,अदा से चलता है
चश्म-ए-पुरनम भी खूँ बहाया करे,
वक़्त पर, वक़्त ही पै ढलता है....
उर्मिला माधव...
28.5.2018....
तज़बज़ुब--- असमंजस
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