देख लूँ क्या ?
इक ज़रासा,रुख़ बदल कर देख लूं क्या,
फिर तुम्हारे साथ चल कर देख लूं क्या?
आंधियों का ज़ोर तो है मंज़िलों तक,
फिर ज़रा गिर कर संम्भल कर देख लूँ क्या?
ज़िंदगी का तो चलन हरदम वही है,
फिर नए सांचे में ढल कर देख लूँ क्या ?
छा गए आ कर अंधेरे रूह पर,
फिर ज़रा ख़ुद से निकल कर देख लूँ क्या?
उर्मिला माधव
Comments
Post a Comment