तनहा मां
एक बचपन,
तनहा माँ,
शिफ़ाखानों के चक्कर
काटती हुई,
अतिब्बा के चेहरे
ताकती हुई,
वो तनहा तीन वर्ष,
याद आ जाता है,माँ को,
शून्य में बस देखना
और सोचना,
कौनसा रिश्ता,खंगालूँ?
शायद कोई भी नहीं,
और अगर कोई है मेहरबां,
सो वो है परवर दिगार,
ज़ख़्म लेकिन बेशुमार,
लानतों से कान छलनी,
और बचा सीना फ़िगार,
यक़-ब-यक़ हो याद आया,
ख़ूब रोना ज़ार-ज़ार..
वक़्त को जाना था,
कबका जा चुका है,
दाग़ पर सीने पे,
कुछ देता गया....
उर्मिला माधव...
19.5.2017
शिफ़ाखानों... अस्पतालों
अतिब्बा... हकीम, डॉक्टर
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