ज़मीन
हम खड़े हैं,
ज़मीन समझ कर जिसे,
खिसक सकती है पैरों तले से,
अद्भुत है,इसका खिसकना,
कभी सदमे देखोगे
तो शायद समझ सको,
क्या होता है ज़मीन खिसकना,
दरारें बड़ी हो जाती हैं,
फिर नहीं भरतीं कभी,
दरारों से घिरा हुआ,
कभी निकल नहीं सकता,
रेत के टीले,कितने भी ऊंचे हों,
धसक जाते हैं,
और नीचे आ जाते हैं,
पल भर में,
इन्सान की
कोई औक़ात नहीं,
जी चाहे तो आज़मा देखो,
ज़मीन की मजबूती को,
जाओ देखो स्वयं को,
भुक्त भोगी की तरह,
बस मेरा दामन बचा रहे,
इसका ख़याल,है मुझको,
उर्मिला माधव...
31.5.2016
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