समझे बंधु

वक़्त सिखाता है ठहराव,
पर तब तक निकल जाता है वक़्त,
क्या करेगा ठहराव,
जब ख़्वाहिशें अक़्ल से बड़ी हों
लौटता कुछ भी नहीं,
वक़्त तो किसी भी क़ीमत पर नहीं,
कोई पहलू कितना भी गर्म हो,
लावा ही उगलता है,
समझ कर भी नहीं समझना
क्या ख़ूब होता है,
पहलू याद आता है माँ का,
घर के कोने, जो तुम्हें क़ैद लगते हैं,
वो बेशक़ीमती हो जाते हैं
अचानक,
दुनियां तो किसी की भी नहीं होती
समझे बंधु
उर्मिला माधव
19.5.2018

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