समझते थे
उसको सबसे जुदा समझते थे,
सच ये है..नाख़ुदा समझते थे,
उसको दर्ज़ा दिया मशाइख का,
खुद को अदना ग़दा समझते थे,
जिसमें था इन्तेहा का रंग रचा,
उसको हम इब्तेदा समझते थे,
दिल को ये रायगाँ यक़ीन रहा,
उसके दिल की सदा समझते थे,
वो तो मिलता रहा तगाफुल से,
हम महज इक अदा समझते थे,
वक़्त गुज़रा तो ये हुआ ज़ाहिर,
फानी था...जाँविदा समझते थे,
उर्मिला माधव....
17.4.2014..
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