जी रहे हैं
अपनी ख़ुद्दारी के दम पर जी रहे हैं।
इस लिए हम ज़ह्र लाखों पी रहे हैं।
बारहा होते मुख़ातिब ज़ख्म अक्सर
हम मुसलसल साथ इसके ही रहे हैं।
ये अनादारी है आदत के मुताबिक
हम न ज़ाती रंग में तरही रहे हैं।
आपसी रिश्ते निभाने के चलन में
यों समझ लो एकदम सतही रहे हैं।
जब जहाँ धोखा धड़ी का दौर आया
इक निशाने इसके बस हम ही रहे हैं।
Urmila Madhav...
22.4.2016
Comments
Post a Comment