खा रहे हैं
सियासत के नाम---
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कितनी छोटी उम्र में बहका रहे हैं,
लोग बच्चों की जवानी खा रहे हैं,
कौन कितनी दूर तक माहिर हुआ है,
दूसरा पहलू फ़क़त दिखला रहे हैं..
कुर्सियों पै बैठकर ऊंचाइयों से ,
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा समझा रहे हैं,
हाथ में बोतल है ऑ शामी क़बाब,
भूख से लड़ने का गुर सिखला रहे हैं,
बाँट कर हिस्से वतन के कर चुके जो,
वाह..!! वन्दे-मातरम् भी ग़ा रहे हैं
उर्मिला माधव...
19.4.2014...
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