बचते हैं
लोग तो ख़ुदकुशी से बचते हैं,
हम हैं के ज़िन्दगी से बचते हैं,
एक ही जिस्म है सो मिट्टी का,
एहतियातन नमी से बचते हैं,
किस लिए दर्द में इज़ाफ़ा हो,
इश्क़ ऑ दिलबरी से बचते हैं,
जिस्म को अब कहां सहूलत है,
इसकी रस्साकशी से बचते हैं,
उर्मिला माधव
लोग तो ख़ुदकुशी से बचते हैं,
हम हैं के ज़िन्दगी से बचते हैं,
एक ही जिस्म है सो मिट्टी का,
एहतियातन नमी से बचते हैं,
किस लिए दर्द में इज़ाफ़ा हो,
इश्क़ ऑ दिलबरी से बचते हैं,
जिस्म को अब कहां सहूलत है,
इसकी रस्साकशी से बचते हैं,
उर्मिला माधव
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