शनास दुनियां

अरबों-खरबों शनास दुनियां,
तेरे इलज़ाम से जड़ी दुनियां,
तेरी नज़रों में बस पड़ी दुनियां,
कौन ख़्वाहिश में किसकी रहता है,
किसके रस्ते में है खड़ी दुनियां?
चलते-चलते थके हुए से क़दम,
रोज़ कुछ दूर और चलते हैं,
रोज़ तकते हैं अपनी वीरानी,
टूट कर बैठ तो नहीं जाते,
और चलते हैं,और चलते हैं,
रहगुज़र साथ साथ चलती है,
ज़िन्दगी आदतन निकलती है,
गिरती पड़ती है फिर संभलती है,
जिस्म की आदतों में ढलती है,
ये ही दुनियां है,यूँ ही चलती है,
उर्मिला माधव,
23.1.2017

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