चोट खाते हैं

गहरे ज़ख़्मों पे चोट खाते हैं,
अहले दिल यूँ ही मुसकुराते हैं,
ग़ुज़रे शामो सहर किसी तरहा,
रात होते ही टूट जाते हैं,
दर्दे क़ुरबत से रू-ब-रू होकर,
चश्मे ग़िरियाँ में डूब जाते हैं  
उर्मिला माधव..
24.1.2013

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