घर से निकल
कैसे जीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल,
आग पीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल,
तेरी खिड़की जो हर इक शाम कहीं बंद हुई,
हाथ रीते हैं इधर देख ज़रा घर से निकल,
कितने गहरे हैं मेरे ज़ख़्म बड़ी मुद्दत से,
ख़ाक जीते हैं, इधर देख ज़रा घर से निकल,
उर्मिला माधव। ...
23 .1 .2017
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