सामान हो गए
तिरछी नज़र की धार पे क़ुर्बान हो गए,
यूँ दिल की खुदकुशी पे पशेमान हो गए,
अपने मिजाज़ में तो कभी आशिक़ी न थी,
पर ऐसा कुछ हुआ के परेशान हो गए,
अंदाज़ अपनी रूह के बस ज्यों के त्यों रहे
हम ही जूनून-ए-इश्क़ का सामान हो गए,
वो याद हमको आये तो मुश्किल गुज़र गई
हम ख़ुद भी अपने आप से बईमान हो गए
फिर यूँ हुआ के रूह से हमने लड़ाई की,
एक रोज़ उनके घर गए,मेहमान हो गए..
दुनियां को दरकिनार भी हमने किया बहुत
ज़िंदान-ए-इश्क़ क्या हुए सुल्तान हो गए
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