आजकल
ज़िन्दगी थक हार कर ही चल रही है आजकल,
खुल सभी की शख़्सियत हर पल रही है आजकल,
एक लहज़ा भीड़ जो देखी तो हम घबरा गए,
अब बची तन्हाई है सो खल रही है आजकल,
दिन निकलते ही उदासी,घिर के आती है सो अब,
दोपहर भी शाम जैसी,ढल रही है आजकल,
उर्मिला माधव,
27.1.2017..
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