फ्री वर्स पैगाम आया है
पैगाम आया है,बाहर से,
लोग कहते हैं के तुम नहीं रहे
और फिर जल भी गए,
बस एक बार,
और मैं हर रोज़ ही ज़िन्दा जली,
क्रम कभी टूटा नहीं,
बिना लकड़ियों की आग में,
मेरी छाती में हजारों आग हैं,
तानों की,लानतों की,
और उन गलतियों की जो कभी कीं ही नहीं,
जो घर से,बाहर से,
हर तरह के रिश्तों से,
घर के बर्तनों की आवाजों से,
जो रोज़ पूछते हैं
तुम अब गाकर क्यूँ कुछ नहीं बनाती?
तुम्हारे गाने की आवाज़ क्यूँ नहीं आती ?
क्या तुम्हें नहीं मालूम संगीत के स्वरों से
लज्ज़त बढ़ती है खाने में,
गाओ ना,
आंसुओं से कोई आग नहीं बुझती,
और मैं स्वर कहाँ से लाऊं,
खो गए और मेरे ये नयन फिर रो गए,
वो तुम्हारे साथ ही तो जल गए,
अब तो मैं हूँ और हैं ये मुश्किलें,
एक इसका हल है मेरे पास में,
प्यार भर देता है मेरी सांस में,
ये ज़माने से अलग है,
और ये मेरे वास्ते बेहद सजग है,
ये ही तो है वो निशानी प्यार की,
बस यही खुशियाँ हैं घर संसार की...
उर्मिला माधव....
19.1.2015....
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