मुसलमां होकर
मैंने सोचा ही नहीं हिन्दू या मुसलमां होकर,
दिल-ए-हस्सास मेरा निकला फ़क़त हां होकर,
एक मज़लूम था बच्चा जो मेरी बाँहों में,
और सब भूल गई सोच फ़क़त मां होकर,
मेरे नज़दीक जो आया था गोल टोपी लिए,
खाना लेना है मुझे जाऊं कहां यां होकर ?
उर्मिला माधव
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