शायद...
फ़िर वो मिलने को आएगा शायद,
कोई किस्सा सुनाएगा शायद,
मुझसे बोला के ठहरो आता हूँ,
क़त्ल ही करके जाएगा शायद,
पहले तजवीज़ मौत की रख्खी,
मर्सिया फ़िर सुनाएगा शायद,
अब तआक़ुब में मारा फिरता है,
घर को खंडहर बनाएगा शायद,
मेरा रब भी किसीसे कम तो नहीं,
रस्म अपनी निभाएगा शायद,
उसकी तख़लीक़ है जहां सारा,
वो ही करतब दिखाएगा शायद,
जो भी आता है, उसको आने दो,
आख़िरश मुड़ के जाएगा शायद,
उर्मिला माधव,
15.9.2018
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