नज़्म आज़ाद
सामने हो भी और नहीं भी हो,
ये जो घेरे तुम्हारी यादों के,
किस तरह घेर कर खड़े हैं सब,
इतने ज़िद्दी हैं घर नहीं जाते,
नींद कहती है हम नहीं आते,
रात है,तीरगी है,तन्हाई,
और क्या-क्या लिखा है हाथों में
आज तो बात बस शहर की है
पर जुदाई तो उम्र भर की है,
नाम सांसों पै लिख लिया तो क्या,
बात किस्मत की तो जुदा सी है
तुमको जाना है,गम को आना है
मुझको बेमन भी मुसकुराना है
और अपना कहाँ ठिकाना है
बिन तुम्हारे ही जीते जाना है
सांस रुक जाये,सब बिखर जाये
तुमको मुड़के कभी न आना है
तुमको मुड़के कभी न आना है
मुझको बस यूँ।ही जीते जाना है
उर्मिला माधव
16.9.2015
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