रख्खा गया
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया,
आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया,
ज़ीस्त में कुछ इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं,
जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया,
बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम,
सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-खुदा रख्खा गया,
फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए,
पंडितों मुल्लाओं को तब नाखुदा रख्खा गया,
ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात,
इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया....
उर्मिला माधव...
1.10.2014...
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