तीन ग़ज़ल
1
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ये तो ज़ाहिर है,वो बिलकुल बे-वफ़ा है,
क्या कहूँ दिल का अलहदा फ़लसफ़ा है,
क्यूँ किसी इन्सान का शिकवा करूँ मैं,
गम मेरी तक़दीर का अव्वल सफ्हा है,
बारहा तन्हाइयां हैं,बारहा वीरां सफ़र भी,
क्या समझते हो महज पहली दफा है??
रंजिशें जमकर निभायीं वक़्त ने भी,
ज़िन्दगी में हर कोई मुझसे खफा है,
वक़्त की...महबूब की,तक़दीर की या,
आप सब बतलाइये किसकी ज़फा है??
उर्मिला माधव
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2
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ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा बिलकुल जुदा रख्खा गया,
आदमी का आदमी से सिलसिला रख्खा गया,
ज़ीस्त में कुछ इस तरह रंगीनियाँ रख्खी गईं,
जिसमें इंसानों को हरदम मुब्तिला रख्खा गया,
बुत बनाया पथ्थरों से और फिर दैर-ओ-हरम,
सर-ब-सजदा होने को नाम-ए-खुदा रख्खा गया,
फिर अदालत भी बनी सब पर हुकूमत के लिए,
पंडितों मुल्लाओं को तब नाखुदा रख्खा गया,
ज़िन्दगी और मौत के जलवों से है ये क़ायनात,
इन्तेहा का नाम तब फिर इब्तेदा रख्खा गया...
उर्मिला माधव
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3
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किसने भेजा है ये पयाम कुछ पता तो करो,
क्या है इलज़ाम मेरे नाम कुछ पता तो करो,
शह्र में किस तरह का शोर आज बरपा है'
सबका है सब्र क्यूं तमाम कुछ पता तो करो...
चार सम्तों में इक नफ़स को जगह है के नहीं,
और क्या क्या है इंतज़ाम कुछ पता तो करो.
ख़ून के रंग में अब रंगी सी लगे रंग ए हिना,
किस तरह का है इंतक़ाम कुछ पता तो करो.
क्यों हवाओं में रंग शामिल है अब सियासत का,
और किस किस का है ये काम कुछ पता तो करो
उर्मिला माधव
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4
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मेरे दिल की किताब रहने दे,
चुप ही रह हर जवाब रहने दे,
चैन मिलना कोई ज़रूरी है ?
ऐसा कर ,इज़्तराब रहने दे,
आँख रोती हैं जा इन्हें ले जा,
मेरे नज़दीक ख्वाब रहने दे,
एक चिलमन बहुत है परदे को
आने-जाने को बाब रहने दे,
तुझको शम्स-ओ-क़मर से तौला था,
अपनी इज़्ज़त की ताब रहने दे,
तू है मजबूर अपनी आदत से
छोड़ बाक़ी हिसाब रहने दे..
ख़ार ख़ुशबू से ख़ूब बेहतर हैं,
ले जा अपने गुलाब रहने दे
तेरी खुशियां तुझे मुबारक हों,
मुझको ख़ाना ख़राब रहने दे,....
उर्मिला माधव...
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5
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राबितों के उसने जो मानी हमें समझा दिए,
दिल के टुकड़े करके हमने क़ब्र में दफ़ना दिए,
नाख़ुदा उसको कहा ऑ हो गए हम खुद हक़ीर,
हमने अपनी सोहबत के हौसले दिखला दिए,
क्या कमी थी बंदगी में ये बता बंदानवाज़,
तूने जो इलज़ाम के तोहफ़े हमें पकड़ा दिए
तंग इतनी हो गई झोली तेरी परवर दिगार,
हैफ़,इज़्ज़त के जनाज़े पाँव से ठुकरा दिए,
तेरी चौखट पर झुके है,इसके ये मानी नहीं,
गम के शोले जिसने चाहा ज़ीस्त में भड़का दिए,
हम न बदलेंगे कभी ये अपना शाहाना मिजाज़,
सुन सरे महफ़िल इरादे हमने।भी बतला दिए...
उर्मिला माधव..
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