फ्री वर्स ---महदूद या मसदूद
दायरे,
महदूद हों या मसदूद
क्या फ़र्क़ है
अगर दिल ही न चाहे बढ़ना
सोच कहीं खुश्क हो गया
तो क्या हो शबनम से
बहुत होगा तो
दरख़्तों की शाखें गीली होंगी
पत्ते भीग जाएंगे
फूल भीग जायेंगे
घास भीग जायेगी
शबनम जी नहीं भिगो सकती
बार-बार चोट खाने से तो
पथ्थर भी टूट जाते हैं
बेहतर है,ख़ुद को समेट लेना
और अब चोट खाने की गुंजाइश
बची भी कहाँ
जब शीरीं जुबां की कड़वाहट
आती है बाहर तो वो कड़वाहट से भी
ज़ियादः कड़वी होती है
और ऐसे ज़हर के घूँट
किन ख्वाहिशात के लिए पिए जाएँ
साथ-साथ चलने की ख्वाहिश
बहुत सी मुहब्बत पा लेने की ख्वाहिश
नहीं ये बे बुनियाद है
बुल्लेशा का कहा कीमती लगता है
"बुल्लैया वे दिल उथ्थे दइए,जेड़ा अगला क़दर पिछाणे"
कच्च दा की पैनणा जेड़ा ठेस लगे टुट जावे"
सब कुछ बे-बुनियाद ही तो है
बिलकुल बे बुनियाद....
असां हुण टुर जाना ऐ
दिन रह गए थोड़े...
#उर्मिलामाधव
30.9.2015
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