निशाने दो
एक ताबूत और सिरहाने दो,
जैसे जी चाहे लेट जाने दो,
इक सुपुर्द-ए-ज़मीं ही बाक़ी है,
दफ़्न इक रस्म है, निभाने दो,
मौत बस आख़री तमाशा है,
इसको इज़्ज़त से रंग लाने दो,
इसको मरके मिसाल होना है,
ज़िन्दगी देके छूट जाने दो
ज़िन्दगी-मौत,दोनों क़ाबिज़ हैं,
आदमी एक और निशाने दो,
उर्मिला माधव
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